श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
तस्य
पावकः॥ ७ ॥
।
अपनी पूंछको बार बार घुमाकर अपने महान् बलका समष्ठावयितुं लोकं सपर्वतनदीह्रदम् ॥ १२ ॥
स्मरण किया ।। ४ ।।
'अपनी भुजाओंके वेगसे समुद्रको विक्षुब्ध करके उसके
संस्तूयमानस्य वृद्धैर्वानरपुङ्गवैः ।
जलसे में पर्वत, नदी और जलाशयोसहित सम्पूर्ण जगत्को
तेजसाऽऽपूर्यमाणस्य रूपमासीदनुत्तमम् ॥ ५ ॥ आपलावित कर सकता हूँ || १२ ।।
बड़े बूढ़े वानरशिरोमणियोंके मुखसे अपनी प्रशसा ममोरुजङ्घावेगेन भविष्यति समुत्थितः।
सुनते और तेजसे परिपूर्ण होते हुए हनुमान्जीका रूप उस
समुत्थितमहाग्राहः समुद्रो वरुणालयः ॥ १३ ॥
समय बड़ा ही उत्तम प्रतीत होता था ।। ५ ।।
'वरुणका निवासस्थान यह महासागर मेरी जाँघों और
यथा विजम्भते सिंहो विवृते गिरिगह्वरे ।
पिंडलियों के वेगसे विक्षुब्ध हो उठेगा और इसके भीतर
मारुतस्यौरसः पुत्रस्तथा सम्प्रति जृम्भते ॥ ६ ॥ रहनेवाले बड़े-बड़े ग्राह ऊपर आ जायेंगे ।। १३ ।।
जैसे पर्वतकी विस्तृत कन्दरामें सिंह अँगड़ाई लेता है, पन्नगाशनमाकाशे पतन्तं पक्षिसेवितम् ।
उसी प्रकार वायुदेवताके औरस पुत्रने उस समय अपने वैनतेयमहं शक्तः परिगन्तुं सहस्रशः ॥ १४ ॥
शरीरको अंगड़ाई ले-लेकर बढ़ाया ॥ ६ ॥
'समस्त पक्षी जिनकी सेवा करते हैं, वे सर्पभोजी
अशोभत मुखं तस्य जम्भमाणस्य धीमतः । विनतानन्दन गरुड़ आकाशमें उड़ते हों तो भी मैं हजारों
अम्बरीषोपमं दीप्तं विधूम इव
बार उनके चारों ओर घूम सकता हूँ ॥ १४ ॥
जभाई लेते समय बुद्धिमान् हनुमान्जीका दीप्तिमान् उद्यात् प्रस्थितं वापि ज्वलन्तं रश्मिमालिनम् ।
मुख जलते हुए भाड़ तथा धूमरहित अग्निके समान अनस्तमितमादित्यमहं गन्तुं समुत्सहे ॥ १५ ।।
शोभा पा रहा था । ७ ।।
ततो भूमिमसंस्पृष्ट्वा पुनरागन्तुमुत्सहे।
हरीणामुत्थितो मध्यात् सम्प्रहृष्टतनूरुहः
प्रवेगेनैव महता भीमेन प्लवगर्षभाः॥१६॥
अभिवाद्य हरीन् वृद्धान् हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ८ ॥ श्रेिष्ठ वानरो ! उदयाचलसे चलकर अपने तेजसे प्रज्वलित
वे वानरोंके बीचसे उठकर खड़े हो गये । उनके होते हुए सूर्यदेवको मैं अस्त होनेसे पहले ही छू सकता हूँ
सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया । उस अवस्थामें हनुमान्- और वहाँसे पृथ्वीतक आकर यहाँ पैर रक्खे बिना ही पुनः
जीने बड़े-बूढ़े वानरोंको प्रणाम करके इस प्रकार कहा-॥८॥ उनके पासतक बड़े भयंकर वेगसे जा सकता हूँ ।। १५-१६ ॥
आरुजन् पर्वताग्राणि हुताशनसखोऽनिलः । उत्सहेयमतिक्रान्तुं सर्वानाकाशगोचरान् ।
बलवानप्रमेयश्च वायुराकाशगोचरः ॥ ९ ॥ सागराशोषयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम् ॥ १७॥
'आकाशमें विचरनेवाले वायुदेवता बड़े बलवान् हैं पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि प्लवमानः प्लवङ्गमः ।
उनकी शक्तिकी कोई सीमा नहीं है । वे अग्निदेवके सखा हरिष्याम्युरुवेगेन प्लवमानो महार्णवम् ॥ १८ ॥
हैं और अपने वेगसे बड़े-बड़े पर्वत-शिखरोंको भी तोड़ 'आकाशचारी समस्त ग्रह-नक्षत्र आदिको लाँघकर आगे
डालते हैं ।। ९॥
बढ़ जानेका उत्साह रखता हूँ। मैं चाहूँ तो समुद्रोंको सोख
तस्याहं शीघ्रवेगस्य शीघ्रगस्य महात्मनः । लूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूंगा और कूद-कूदकर पर्वतोंको
मारुतस्यौरसः पुत्रः प्लवनेनास्मि तत्समः ॥ १० ॥ चूर-चूर कर डालूँगा; क्योंकि मैं दूरतककी छलाँगें मारने-
अत्यन्त शीघ्र वेगसे चलनेवाले उन शीघ्रगामी वाला वानर हूँ। महान् वेगसे महासागरको फाँदता हुआ मैं
अवश्य उसके पार पहुँच जाऊँगा ।। १७-१८ ॥
महात्मा वायुका मैं औरस पुत्र हूँ और छलाँग मारनेमें
उन्हींके समान हूँ ॥ १० ॥
लतानां विविधं पुष्पं पादपानां च सर्वशः।
उत्सहेयं हि विस्तीर्णमालिखन्तमिवाम्बरम् । अनुयास्यति मामद्य प्लवमानं विहायसा ॥ १९॥
मेरुं गिरिमसङ्गेन परिगन्तुं सहस्रशः ॥ ११ ॥ 'आज आकाशमें वेगपूर्वक जाते समय लताओं और
'कई सहस्र योजनोंतक फैले हुए मेरुगिरिकी, जो वृक्षोंके नाना प्रकारके फूल मेरे साथ-साथ उड़ते जायँगे ॥१९॥
आकाशके बहुत बड़े भागको ढके हुए है और उसमें रेखा भविष्यति हि मे पन्थाः खातेः पन्था इवाम्बरे ।
खींचता-सा जान पड़ता है, मैं बिना विश्राम लिये सहस्रों बार चरन्तं घोरमाकाशमुत्पतिष्यन्तमेव च॥२०॥
परिक्रमा कर सकता हूँ ॥ ११ ॥
द्रक्ष्यन्ति निपतन्तं च सर्वभूतानि वानराः।
बाहुवेगप्रणुन्नेन सागरेणाहमुत्सहे।
'बहुत-से फूल बिखरे होनेके कारण मेरा मार्ग आकाशमें.
No comments:
Post a Comment