Kirtan -1- Dt.18 07 21-
Kirtan -1- Dt.18 07 21
Kirtan -1- Dt.18 07 21
- । कीर्तनकौस्तुभमाळा ॥
(वसंततिलका वृत.)
मोरा पितामहजी ने वरदान आपी,
जेणे कडुं तव सुपौत्र थशे प्रतापी;
ते धर्मना तनुज श्रेष्ठ करो सहाय,
जेथी वधां विघन दुर जरुर जाय.
जेना प्रताप थकी आ पदवी हुँ पाम्यो,
जेना प्रताप थकी शोक सहुँ विराम्यो
जेनो प्रताप जग मंगल रूप जाणुं,
एवा श्री भक्ति सुतने उर नित्य आणु.-(४)
॥प्रार्थनाष्टक.॥
(उपजातिछंद.)
श्रीजी तणो प्रौढ घणो प्रताप,
करे सदा थाप उाप आप;
अति-दयाळं प्रभु अक्षरेश,
वंदु हरि स्नेह धरी हमेश.
जेनी कृपाथी जन सुखी थाय,
जेनी कृपाथी दुःख दूर जाय
जेनी कृपाथी उधरे अशेष,
बंदु हरि स्नेह धरी हमेश.
१ श्रीगोपाळजी महाराजने भाजी महाराजे वरदान भाप्प इतुं के-
तमारा पुत्रनो पुत्र (श्रीविहारीलालजा महाराज) महाप्रतापी थी.
२ सपौत्र-पुत्रनो पुत्र. । धर्मना तनुन बमदेवना कुमार. थाप प्रथा
पथ स्वतंत्र, (फर्तुमक ने अन्यथाकर्त ॥) ५ अशेष-समय,
-(८)
॥ कीर्तनकौस्तुभमाळा ॥
जेणे कळिमां नरदेह धारी,
स्वधर्म स्थाप्यो जन हितकारी;
काढ्यो कळिने ग्रही शिरॅकेश,
वंदु हरि स्नेह धरी हमेश.
जो शर्ण आवे जन दीन कोय,
भली रीते निर्भय तेह होय;
पामे नहीं कष्ट कदापि लेश,
वंदु हरि स्नेह धरी हमेश.
नथी नथी मोक्ष समान दान,
नथी नथी आत्म समान ज्ञान;
ते दी● सौने दई उपदेश,
वंदु हरि स्नेह धरी हमेश.
जेछे कृपानी करनार वृष्टिः
सुखी करे दृष्टि थकीज सृष्टिः
छे मिष्ट वाणी बहु जेनी बेश,
वंदु हरि स्नेह धरी हमेश.
सर्वोपरि आ सतसंग थापी,
आचारजोने निज गादी आपी;
जेना गुणो गाय सदा गणेश
वंदु हरि स्नेह धरी हमेश.
जे काव्य का निज संत पासे,
पद्यो करावी सुणता हुलासे
राजी थता ते सुणीने रमेश
बहुँ हरि स्नेह धरी हमेश.
जेणे मने सुख अपार आप्युं.
समे समे कष्ट समय काप्युः
--(९)
--(१०)
--(११)
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॥ कीर्तनकौस्तुभमाळा ॥
ते श्रीहरिनी स्मृति उर थावा,
करुं रुडां कीर्तन गुण गावा. -(१३)
॥शोडशदळकमळप्रबन्ध ॥
(सवैयो.)
नमुं महाराज, गरीब निवाज,
सदा शिरताज, जगत्त जहाज,
मुसंत समाज, तणां मुनिराज,
का शुभकाज, अविचल आज;
तमे व्रजराज, थई महाराज,
दईत हण्याज, घणाज घणाज,
लीधी अरि लाज, त्रिभुवन ताज,
धुरंधर आज, दीधो मुखसाज.
--(१४)
त्रिभुवनता
(लीधीअरिला
घणाजषणा
दीघोसुरवसा
थुरंधर
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Thas bal
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१/नमुमहारा
ज
rankuta
Se
गरीब निवा
सदाशिरता
जगत्तजहा
उसत समा
तणांमुनीरा
HARYANHATHOR
॥ कीर्तनकौस्तुभमाला ॥
॥बहिलापिका॥
(शार्दूलविक्रीडितछंद ).
जे आवे शरणे शुं ? नाम वदी ए, शुं ? होय सुकाममां,
सारं अंग कियुं ? शुं ? नाम शिशुओ, शिखेज जे धाममा
पामे मोह मनुष्य नाम समजो, को? राय पासे वसे,
आ प्रश्नोत्तर मध्यवर्ण मुजने आनंद दाता थशे. (१५)
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१ सुकाम-सा काम. २सा अंग किए-आनन-मुख,
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॥ कीर्तनकौस्तुभमाळा ॥
(मालिनीछंद.)
अखिलपति अमारी विनती उरधारो,
विघन सघन आवे वेगथी ते विदारो;
निरमळ मति आपो काव्य सारी कराय,
सदगुणि जन शाणा सांभळी राजी थाय. (१६)
॥ कीर्तनकौस्तुभमाळा ॥
तेने कविता गमशेज तेवी
सुबोधने श्रीहरि गुणसार,
मुने रुचे एह सदा अपार;
जे सांभळीने मति मेली थाय,
सारा जनो तो शरमाइ जायः
तेवी कविता दुरथीज टाळो,
उनामणामां धरीने उकाळो.
(१८)
-(१९)
॥ ग्रंथप्रयोजन ॥
(मनहरछंद.)
भक्ति भगवाननी छे नवधा प्रकारवाळी,
जेने जेवी रुचे तेवी ते करे वखाणीने
किर्त्तनभक्तिनुं जेनुं अंग होय तेह तेमां,
तदाकार थै संभारे हरि उर आणीने;
एवा भक्त गाय हरि गुणने रंजन थाय,
वांचीने विचारे वळी सुबोधनी वाणीने
पुस्तक आ एज प्रयोजन उर आणी रच्यु,
सतसंगी जनने जीवन रूप जाणीने
॥ गायनविषे॥
(मनहरछंद.)
गानविद्या तणा गुण गणतां गणाय नहीं,
एतो एक उपवेद सामनो गणायछे
रोतुं होय वाळक ते राग सुणी छानुं रहे,
नारीओने नर गुलतान थई जायछे; -(२०)
रंक तथा राय जन रागथी रंजन थाय,
मृगलाने मणीधर रागथी रीझायछे
श्रीजीमहाराज पण गवैयानां गान सुणी,
राजी थता बहु हजी मुणवा चहायछे. -(२१)
(श्लोकः)
(१७)
॥काव्यकर्त्तानी रुची॥
(उपजाति छंद.)
जेने रुची अंतर होय जेवी,
यथा नयेच्छतशृंगं, नगं गानसरस्वती ।।
तथा नयेच्छतशृंगं, न गंगा न सरस्वती ।। -(२२)
१ सघन-घणां. २ विदारो-नाश करो.
- ॥ कीर्तनकौस्तुभमाळा ॥
अर्थः—घणा शृंगवाळो जे गोलोकनो शतशृंग पर्वत छे,
त्यां माणसने जेवी रीते गाननी वाणी पहोंचाडी शके छे, तेवी
रीते ते पर्वतनी पासे माणसने गंगाजीके सरस्वती पहोंचाडी
शकती नथी; एवो गान वाणीनो महिमाछे.
॥ कीर्तनकौस्तुभमाळा॥
रागोत्पति ।। दोहा ।।
सा, री,ग,म,प,ध,नी. सप्तस्वर, तेमजछे त्रणग्राम;
मुरछना एकवीशथी, उपज्या राग तमाम. -(६)
रागने रागणीओ मळी, छत्रीश भेद श्रीकार;
पण व्याप्यो आविश्वमां, एनो बहु परिवार – (७)
॥ पूरुषोत्तम नारायणर्नु माहात्म
पूर्वक ध्यान॥
(राग ईंग्रेजी ढवनोबनझारो.)
(मनहरछंद)
मेघ गाजे त्यारे गाय मयूर मल्हारराग,
कोकिला मधूर गाय वसंतने समेछ
कूकडा प्रभाती राग गायछे प्रभात समे,
भ्रमर आनंदभर गाता गाता भमेछे
सुणीने सिंधुडो राग शूराओने शौर्य चडे,
हरि गुण गान हरिना जनोंने गमे छे;
प्रेमीओने प्रेम जामे वैरागी वैराग पामे,
गान तणा शब्द सौने रगे रगे रमेछ. -(२३)
राग सुणी सुणनार हृदये रंगाई जाय,
भले होय भाई तेह सधैनी के अधनी;
विषयी जनो रंगाय विषयना राग मांहि,
मृग जेम चिंता तजे निज वपु वधैनी;
शेरडीनी शी? मीठाश शी? मीठाश साकरनी,
दूध दहिं माखणके शी ? मीठाश मधनी;
अमृतथी अधिकतो भलो रस त्यांज भासे,
ज्यां गवाय सात स्वर, स,रि,ग,म,प,ध,नी. -(२४
१ सधनीक अधनी-धनवंत अने निर्धन. २ निजवपु वधनी-पोताना
शरीरना नाशनी.
जय हरि, (६) सकल जग स्वामी,
अखिलेश्वर अक्षर धामी
-(टेक.)
१ षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत्त, निषाद ए
सातना अंक अक्षरथी सा, री, ग, म, प, ध, नी. ए सात स्वर छे. सा,
री, ग, म, प, ध, नी नो आरोह अने अवरोह एटले चडता स्वर अने
उतरता स्वर, तेमज ते स्वरनां जुथ छूटा पाडवांने कोमळ स्वरमा
मेळाववां तेने मूर्छनाओ कहेछे; तेना एकवीश भेदछे.
मूळराग छ रे तेनां नाम.-भैरव, मालकोश, हिंडोर, दीपक,
श्रीराग, ने मल्हार ए छ छे. ते दरेकने पांच पांच रागणीओ (स्त्री) हे.
तेमळीने राग रागणीओना छत्रीश भेद छे.
तेमज प्रत्येक रागणीने पांच पांच पुत्र अने पांच पांच पुत्रीओके.
तेओना परस्परना संबंधने तीधे तेनो एटलो विस्तार वधी गयेलो के
ते त्रणे लोकमां फेलाई गयो छे.
एवी रीते आ मंधना रागो पण, संगीत वेत्ताओ) परस्सरना
संबंधानुसारे शोधी काढला छे.
- Jay Shree krushna
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