Sunday, April 10, 2022

Vol-2 Shree Valmiki Ramayana Mahima

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणमाहात्म्ये

करनेवाली) होंगी । भिक्षासे जीवन-निर्वाह करनेवाले संन्यासी वर्णन है । वह काव्य अपने पाठक और श्रोताओं के लिये
भी मित्र भादिके स्नेह-सम्बन्भमैं बँधे रहनेवाले होंगे ॥११॥ समस्त कल्याणमयो सिद्धियाँको देनेवाला है ।। २० ॥
अन्नोपाधिनिमित्तेन शिष्यान् बनन्ति लोलुपाः ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां हेतुभूतं महाफलम् ।
उभाभ्यामपि पाणिभ्यां शिरःकण्डूयनं स्त्रियः ॥ १२ ॥
अपूर्व पुण्यफलदं शृणुध्वं सुसमाहिताः ॥ २१॥
कुर्वन्त्यो गृहभर्तृणामाशां भेत्स्यन्त्यतन्द्रिताः ।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थीका
वे भोजनके लिये चिन्तित होनेके कारण लोभवश साधक है, महान् फल देनेवाला है। यह अपूर्व काव्य पुण्यमय
शियोका संग्रह करेंगे । स्त्रियाँ दोनों हाथोंसे सिर खुजलाती फल प्रदान करनेकी शक्ति रखता है । आपलोग एक प्रचित
हुई गृहपतिकी आज्ञाका जान-बूझकर उल्लङ्घन करेंगी ॥
होकर इसे श्रवण करें ।। २१ ।।
पाखण्डालापनिरताः पाखण्डजनसङ्गिनः ॥ १३ ॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकः
यदा द्विजा भविष्यन्ति तदा वृद्धि गतः कलिः । श्रुत्वैतदार्ष दिव्यं हि काव्यं शुद्धिमवाप्नुयात् ॥ २२ ॥
जब ब्राह्मण पाखण्डी लोगोंके साथ रहकर पाखण्डपूर्ण रामायणेन वर्तन्ते सुतरां ये जगद्धिताः ।
बातें करने लगें, तच जानना चाहिये कि कलियुग खूब त एव कृतकृत्याश्च सर्वशास्त्रार्थकोविदाः ॥ २३॥
बढ़ गया ॥ १३ ॥
घोरे कलियुगे ब्रह्मन् जनानां पापकर्मिणाम् ॥ १४॥
महान् पातकों अथवा सम्पूर्ण उपपातकोंसे युक्त मनुष्य
भी उस ऋषि-प्रणीत दिव्य काव्यका श्रवण करनेसे शुद्धि
मनःशुद्धिविहीनानां निष्कृतिश्च कथं भवेत् ।
( अथवा सिद्धि ) प्रात कर लेता है । सम्पूर्ण जगात के हित-
ब्रह्मन् ! इस प्रकार घोर कलियुग आनेपर सदा पाप- साधनमें लगे रहनेवाले जो मनुष्य सदा रामायण के अनुसार
परायण रहनेकै कारण जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हो बर्ताव करते हैं, वे ही सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मको समझनेवाले
सकेगा, उन लोगोंकी मुक्ति कैसे होगी ? ॥ १४३ ।। और कृतार्थं हैं ।। २२-२३ ॥
यथा तुष्यति देवेशो देवदेवो जगद्गुरुः ॥ १५॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं च द्विजोत्तमाः ।
ततो वदस्व सर्वज्ञ सूत धर्मभृतां वर ।
श्रोतव्यं च सदा भक्त्या रामायणपरामृतम् ॥ २४॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ सूतजी ! देवाधिदेव देवेश्वर विप्रवरो ! रामायण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधन
जगद्गुरु भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकार संतुष्ट हो, वह
तथा परम अमृत रूप है; अतः सदा भक्तिभावले उसका
उपाय हमें बताइये ॥ १५३ ।।
श्रवण करना चाहिये ॥ २४ ॥
वद
सूत मुनिश्रेष्ठ सर्वमेतदशेषतः ॥ १६॥ पुरार्जितानि पापानि नाशमायान्ति यस्य वै ।
कस्य नो जायते तुष्टिः सूत त्वद्वचनामृतात् ॥ १७ ॥ रामायणे महाप्रीतिस्तस्य वै भवति ध्रुवम् ॥ २५ ॥
मुनिश्रेष्ठ सूतजी ! इन सारी बातोंपर आप पूर्णरूपसे ॐ जिस मनुष्य के पूर्वजन्मोपार्जित सारे पाप नष्ट हो जाते
प्रकाश डालिये । आपके वचनामृतका पान करनेसे किसको हैं, उसीका रामायण के प्रति अधिक प्रेम होता है । यह निश्चित
संतोष नहीं होता है ।। १६-१७ ||
बात है ॥ २५ ॥
रामायणे वर्तमाने पापपाशेन यन्त्रितः ।
शृणुध्वमृषयः सर्वे यदिष्टं वो वदाम्यहम् । अनादृत्य असद्गाथासक्तवुद्धिः
प्रवर्तते ॥ २६॥
गीतं सनत्कुमाराय नारदेन महात्मना ॥ १८ ॥ • जो पापके बन्धनमें जकड़ा हुआ है, वह रामायणको
रामायणं महाकाव्यं सर्ववेदेषु सम्मतम् । कथा आरम्भ होनेपर उसकी अवहेलना करके दूसरी-दूसरी
सर्वपापप्रशमनं दुएग्रहनिवारणम् ॥ १९॥
निम्नकोरिकी बातोंमें फँस जाता है । उन असद्गाथाओमें
अपनी बुद्धि के आसक्त होने के कारण वह तदनुरूप ही बर्ताव
सूतजीने कहा-मुनिवरो ! आप सब लोग सुनिये ।
करने लगता है ॥ २६ ॥
आपको जो सुनना अभीष्ट है, वह मैं बताता हूँ। महात्मा
रामायणं नाम परं तु काव्यं
नारदजीने सनत्कुमारको जिस रामायण नामक महाकाव्यका
गान सुनाया था। वह समस्त पापोंका नाश और दुष्ट ग्रहोंकी
शृणुत द्विजेन्द्राः ।
बाधाका निवारण करनेवाला है । वह सम्पूर्ण वेदार्थोंकी यस्मिञ्छुते जन्मजरादिनाशो
सम्मतिके अनुकूल है ।। १८-१९ ॥
भवत्यदोषः स नरोऽच्युतः स्यात् ॥ २७ ॥
दुःस्वप्ननाशनं धन्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् । इसलिये द्विजेन्द्रगण ! आपलोग रामायण नामक परम
रामचन्द्रकथोपेतं
सर्वकल्याणसिद्धिदम् ॥ २० ॥ पुण्यदायक उत्तम काव्यका श्रवण करें; जिसके सुननेसे जन्म)
उससे समस्त दुःस्वप्नोंका नाश हो जाता है । वह जरा और मृत्युके भयका नाश हो जाता है तथा श्रवण करने-
धन्यवादके योग्य तथा भोग और मोक्षरूप फल प्रदान वाला मनुष्य पाप-दोषसे रहित हो अच्युतस्वरूप हो
करनेवाला है । उसमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी लीला-काका जोता है ।। २७ ॥
सूत उवाच
सुपुण्यदं वै
Manishbhai G Gajjar Na
Jay Shree Ram 

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