Kirtan=2 on Dt.12/07/2021 by Manishbhai Gajjar
॥ कीर्तनकौस्तुभमाळा ॥
(पद राग गरची)
"लगाडी ते प्रीतिलाल, प्रीतलडि तें तो लगाडी;" ए राग प्रमाणे.
अति आनंदनो दिन आज, विहारीजीलाल पधार्या.
हरिजननो ते हरख्यो समाज, विहारीजीलाल पधार्याः (टेक)
सत्संगी जन सर्वने, आनंद उर उभराय;
आव्यु उत्तम पर्व छे, जाणे जोता ते एम जणाय,
विहारीजीलाल०--(१)
धर्मधुरंधर धरणीमां, जनहित फरो हमेश;
उज्ज्वळ कीर्ति आपनी, व्यापी विश्वमा एथी विशेष.
विहारीजीलाल० - (२)
विद्या वदनविषे वसी, दया वसी दिल्ल मांड;
सदगुणनी सीमा तमे, पेखी पूरण प्रेम पमाय.
विहारीजीलाल. -(३)
सूर्य समान प्रतापीछो, प्रगट प्रभुना पुत्र;
हरिजनना मुखकमळने, आज फूलाव्यां परम पवित्र.
विहारीजीलाल० -(४)
शीतळ चंद्र समानछो, शान्तिना करनार;
हरिजन नेत्रचकोरते, जुओ निरखे छे वारंवार
विहारीजीलाल-(५)
मेष समान महान छो, अंतर अधिक उदार;
पंडित पामे आपथी, सभा जनमा सारो सतकार.
विहारीजीलाल
(६)
अमृतनी दृष्टि करी, टाळ्या त्रिविधी ताप;
दर्शन दीधां दासने, धन्य धन्य प्रताप अमाप.
विहारीजीलाल.--(७)
काज करो सत्संगनां, वधो लक्ष गणी लाज;
सर्व मळी आशिष दे, सोपो श्रीहरि सुखसमाज.
विहारीजीलाल-(८)
पद ॥२॥
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JAY Shree krushna
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