प्रथमोऽध्यायः
२
घरं वरेण्यं वरदं तु काव्यं
चैत्र, माघ और कार्तिक शुक्लपक्षमें परम पुण्यमय
संतारयत्याशु च सर्वलोकम् । रामायण-कथाका नवाह-पारायण करना चाहिये तथा नौ दिनों-
संकल्पितार्थप्रदमादिकाव्यं
तक इसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये ॥ ३४ ।।
थत्वा च रामस्य पदं प्रयाति ॥२८॥ रामायणमादिकाव्यं स्वर्गमोक्षप्रदायकम् ।
रामायण काव्य अत्यन्त उत्तम, वरणीय और मनोवाञ्छित
वर देनेवाला है । वह उसका पाठ और श्रवण करनेवाले समस्त
तस्माद् घोरे कलियुगे सर्वधर्मवहिष्कृते ॥ ३५ ॥
नवनिर्दिनः श्रोतव्यं रामायणकथामृतम् ।
जगत्को शीघ्र ही संसारसागरसे पार कर देता है। उस आदिकाव्यको
सुनकर मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीके परमपदको प्राप्त कर लेता है ।।
रामायण आदिकाव्य है । यह स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला
ब्रह्मेशविष्ण्वाख्यशरीरभेदै-
है, अतः सम्पूर्ण धर्मोंसे रहित घोर कलियुग आनेपर नौ दिनों में
रामायणकी अमृतमयी कथाको श्रवण करना चाहिये ||३५३॥
विश्वं सृजत्यत्ति च पाति यश्च । रामनामपरा ये तु घोरे कलियुगे द्विजाः ॥ ३६॥
तमादिदेवं परमं वरेण्य-
त एव कृतकृत्याश्च न कलिर्वाधते हि तान् ।
माधाय चेतस्युपयाति मुक्तिम् ॥ २९ ॥
आहाणो ! जो लोग भयंकर कलिकालमें श्रीरामनामका
जो ब्रह्मा, रुद्र और विष्णु नामक भिन्न-भिन्न रूप
आश्रय लेते हैं, वे ही कृतार्थ होते हैं। कलियुग उन्हें बाधा
धारण करके विश्वकी सष्टि, संहार और पालन करते हैं, उन
नहीं पहुंचाता ।। ३६३ ।।
आदिदेव परमोत्कृष्ट परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीको अपने हृदय- कथा रामायणप्यापि नित्यं भवति यद्गृहे ॥ ३७॥
मन्दिरमें स्थापित करके मनुष्य मोक्ष का भागी होता है ।।२९||
तद् गृहं तीर्थरूपं हि दृष्टानां पापनाशनम् ।
यो नामजात्यादिविकल्पहीनः
जिस घरमें प्रतिदिन रामायणको कथा होती है वह तीर्थरूप
परावराणा परमः परः स्यात् ।
हो जाता है । वह जानेसे दुष्टोंके पापोंका नाश होता है ।।३७१।।
वेदान्तवेद्यः वरुचा प्रकाशः
तावत्पापानि देहेऽस्मिन् निवसन्ति तपोधनाः ॥ ३८ ॥
स वीक्ष्यते सर्वपुराणवेदैः ॥ ३० ॥
यावन्न श्रयते सम्यक श्रीमद्रामायणं नरैः।
जो नाम तथा जाति आदि विकल्पोंसे रहित, कार्य- तपोधनो ! इस शरीर में तभीतक पाप रहते हैं, जबतक
कारणसे परे; सर्वोत्कृष्ट वेदान्त शास्त्रके द्वारा जाननेयोग्य एवं मनुष्य श्रीरामायणकथाका भलीभांति श्रवण नहीं करता।३८३।।
अपने ही प्रकाशते प्रकाशित होनेवाला परमात्मा है, उसका दुर्लभैव कथा लोके श्रीमद्रामायणोद्भवा ॥ ३९ ॥
समस्त वेदों और पुराणों के द्वारा साक्षात्कार होता है ( इस कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते ।
रामायणके अनुशीलनसे भी उसीकी प्राप्ति होती है।)॥३०॥ संसारमें श्रीरामायणकी कथा परम दुर्लभ ही है। जब करोड़ों
ऊर्जे माघे सिते पक्षे चैत्रे च द्विजसत्तमाः । जन्मोंके पुण्योंका उदय होता है तभी उसकी प्राप्ति होती है।।३९।।
नवाहा खलु श्रोतव्यं रामायणकथामृतम् ॥ ३१ ॥ ऊर्जे माघे सिते पक्षे चैत्रे व द्विजसत्तमाः ॥ ४० ॥
विनवरो ! कार्तिक, मार और चैत्रमासके शुक्ल पक्षमें ना यस्य श्रवणपात्रेण सौदासोऽपि विमोचितः ।
दिनोंमें रामायणकी अमृतमयी कथाका श्रवण करना चाहिये। श्रेष्ठ वाहाणो ! कार्तिक, माघ और चैत्रके शुक्लपक्षमें
इत्येवं शृणुयाद् यस्तु श्रीरामचरितं शुभम् । रामायणके श्रवणमात्रमे ( राक्षसभावापन्न ) सौदास भी शापमुक्त
सर्वान् कामानवाप्नोति परत्रामुत्र चोत्तमान् ॥ ३२ ॥
हो गये थे || ४०३ ॥
जो इस प्रकार श्रीरामचन्द्र जीके मङ्गलमय चरित्रका गौतमशापतः प्राप्तः सौदासो राक्षसी तनुम्॥४१॥....
श्रवण करता है, वह इस लोक और परलोकमें भी अपनी समस्त रामायणप्रभावेण विमुक्ति प्राप्तवान् पुनः ।
उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। ३२ ।।
सौदासने महर्षि गौतमके शापसे राक्षस-शरीर प्राप्त
त्रिसप्तकुलसंयुक्तः सर्वपापविवर्जितः। किया था । वे रामायणके प्रभावसे ही पुनः उस शापसे
प्रयाति रामभवनं यत्र गत्वा न शोचते ॥३३॥ छुटकारा पा सके थे ।। ४१३ ॥
वह सब पापोंसे मुक्त हो अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ यस्त्वेतच्छृणुयाद्भक्त्या रामभक्तिपरायणः ॥४२॥
श्रीरामचन्द्रजीके उस परमधाममें चला जाता है, जहाँ जाकर स मुच्यते महापापैः पुरुषः पातकादिभिः ॥ ४३॥
मनुष्यको कभी शोक नहीं करना पड़ता
है || ३३ ।।
जो पुरुष श्रीरामचन्द्रजीकी भक्तिका आश्रय ले प्रेमपूर्वक
चैत्र माघे कार्तिके च सिते पक्षे च वाचयेत् । इस कथाका श्रवण करता है, वह बड़े-बड़े पापों तथा पातक
आदिसे मुक्त हो जाता है ।। ४२-४३ ॥
नवाहस्सु महापुण्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः ॥ ३४ ॥
इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे नारदसनत्कुमारसंवादे रामायणमाहात्म्ये कल्पानुकीर्तनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें नारद-सनत्कुमार-संवादके अन्तर्गत रामायणमाहात्म्यविषयक कल्पका अनुकीर्तन
नामक पहला अध्याय पूरा हुआ॥१॥
Manishbhai G Gajjar Na
Jay Shree Ram aum.
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