श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण
पतानीह नगस्यास्य शिलासंकटशालिनः ॥३६॥ महान् पर्वत सिंहसे आक्रान्त हुए महान् मदमत्त गजराजकी
शिखराणि महेन्द्रस्य स्थिराणि च महान्ति च । भाँति चोत्कार-सा करने लगा ( वहाँ रहनेवाले प्राणियोंका
येषु वेगं गमिष्यामि महेन्द्रशिखरेष्वहम् ॥ ३७॥ शब्द ही मानो उसका आर्त्त चीत्कार था) ॥ ४३ ।।
नानाद्रुमविकीर्णेषु धातुनिष्पन्दशोभिषु। मुमोच सलिलोत्पीडान् विप्रकीर्णशिलोश्शयः।
'शिलाओंके समृहसे शोभा पानेवाले केवल इस महेन्द्र वित्रस्तमृगमातङ्गः प्रकम्पितमहाद्रुमः ॥ ४४॥
पर्वतके ये शिखर ही ऊँचे ऊँचे और स्थिर हैं, जिनपर नाना उसके शिलासमूह इधर-उधर बिखर गये । उससे नये
प्रकारके वृक्ष फैले हुए हैं तथा गैरिक आदि धातुओंके नये झरने फूट निकले। वहाँ रहनेवाले मृग और हाथी भयसे
समुदाय शोभा दे रहे हैं। इन महेन्द्र-शिखरोंपर ही वेगपूर्वक थर्रा उठे और बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाकर झूमने लगे ॥४४॥
पैर रखकर मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा ॥ ३६-३७३ ॥ नानागन्धर्वमिथुनः पानसंसर्गकर्कशैः।
एतानि मम वेगं हि शिखराणि महान्ति च ॥ ३८॥ उत्पतद्भिर्विहंगैश्च विद्याधरगणैरपि ॥४५॥
प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामितः शतम् । त्यज्यमानमहासानुः
संनिलीनमहोरगः।
'यहासे सौ योजनके लिये छलाँग मारते समय महेन्द्र- शैलशृङ्गशिलोत्पातस्तदाभूत् स महागिरिः ॥ ४६॥
पर्वतके ये महान् शिखर ही मेरे वेगको धारण कर
मधुपानके संसर्गसे उद्धत चित्तवाले अनेकानेक गन्धर्वो के
सकेंगे' ।। ३८३॥
जोड़े, विद्याधरोंके समुदाय और उड़ते हुए पक्षी भी उस
ततस्तु मारुतप्रख्यः स हरिर्मारुतात्मजः ।
पर्वतके विशाल शिखरोंको छोड़कर जाने लगे। बड़े-बड़े सर्प
आरुरोह नगश्रेष्ठ महेन्द्रमरिमर्दनः ॥ ३९॥
बिलोंमें छिप गये तथा उस पर्वतके शिखरोंसे बड़ी-बड़ी
यो कहकर वायुके समान महापराक्रमी शत्रुमर्दन पवन-
शिलाएँ टूट-टूटकर गिरने लगी। इस प्रकार वह महान्
कुमार हनुमानजी पर्वतोंमें श्रेष्ठ महेन्द्रपर चढ़ गये ॥ ३९ ॥
पर्वत बड़ी दुरवस्थामें पड़ गया ॥ ४५-४६ ।।
वृतं नानाविधैः पुष्पैगसेवितशावलम् । निःश्वसद्भिस्तदा तैस्तु भुजगैरर्धनिःसृतः ।
लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम् ॥ ४०॥ सपताक इवाभाति स तदा घरणीधरः ॥४७॥
वह पर्वत नाना प्रकारके पुष्पयुक्त वृक्षोंसे भरा हुआ बिलोंसे अपने आधे शरीरको बाहर निकालकर लंबी
था, वन्य पशु वहाँकी हरी-हरी घास चर रहे थे, लताओं और साँस खींचते हुए सोसे उपलक्षित होनेवाला वह महान्
फूलोंसे वह सघन जान पड़ता था और वहाँके वृक्षोंमें सदा पर्वत उस समय अनेकानेक पताकाओंसे अलंकृत-सा प्रतीत
ही फल-फूल लगे रहते थे ।। ४० ॥
होता था।॥ ४७ ॥
सिंहशार्दूल सहितं मत्तमातङ्गसेवितम्। ऋषिभिस्वाससम्भ्रान्तैस्त्यज्यमानः शिलोच्चयः ।
मत्तद्विजगणोद्घष्टं सलिलोत्पीडसंकुलम् ॥ ४१ ॥ सीदन् महति कान्तारे सार्थहीन इवाध्वगः ॥ १८ ॥
महेन्द्र पर्वतके वनोंमें सिंह और बाघ भी निवास करते भयसे घबराये हुए ऋषि मुनि भी उस पर्वतको छोड़ने
थे, मतवाले गजराज विचरते थे, मदमत्त पक्षियोंके समूह लगे। जैसे विशाल दुर्गम वनमें अपने साथियोंसे बिछुड़ा हुआ
सदा कलरव किया करते थे तथा जलके स्रोतों और झरनोंसे एक राही भारी विपत्तिमें फँस जाता है, यही दशा उस महान्
वह पर्वत व्यात दिखायी देता था ॥ ४१ ।।
पर्वत महेन्द्रकी हो रही थी ॥ ४८ ।।
महद्भिरुच्छ्रितं शृङ्गैर्महेन्द्रं स महाबलः ।
स वेगवान् वेगसमाहितात्मा
विचचार हरिश्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः ॥४२॥
हरिप्रवीरः परवीरहन्ता।
बड़े बड़े शिखरोंसे ऊँचे प्रतीत होनेवाले महेन्द्र पर्वतपर
समाधाय महानुभावो
आरूढ़ हो इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली कपिश्रेष्ठ हनुमान्
जगाम लङ्कां मनसा मनखी ॥४९॥
वहाँ इधर-उधर टहलने लगे ॥ ४२ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वानरसेनाके श्रेष्ठ वीर वेग
पादाभ्यां पीडितस्तेन महाशैलो महात्मना । शाली महामनस्वी महानुभाव हनुमान्जीका मन वेगपूर्वक
ररास सिंहाभिहतो महान् मत्त इव द्विपः ॥४३॥ छलाँग मारनेकी योजनामें लगा हुआ था। उन्होंने चित्तको
महाकाय हनुमानजीके दोनों पैरोंसे दबा हुआ वह एकाग्र करके मन-ही-मन लङ्काका स्मरण किया ।। ४९ ॥
इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
किष्किन्धाकाण्डं सम्पूर्णम्
मनः
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