Friday, January 1, 2021

2, Gita Mahatmay on Mahabharat

श्रीपरमात्मने नमः
विद्यते ॥
महाभारतमें श्रीगीताजीका माहात्म्य
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यः शास्त्रसंग्रहैः ।
या स्वयं
पद्मनाभस्य मुखपद्याद्विनिःसृता ।।
सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरिः।
सर्वतीर्थमयी
गङ्गा
सर्ववेदमयो
मनुः॥
गीता गङ्गा च गायत्री गोविन्देति हृदि स्थिते ।
चतुर्गकारसंयुक्त पुनर्जन्म न
भारतामृतसर्वस्वगीताया मथितस्य
सारमुद्धृत्य
कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम् ।।
(महा० भीष्म० ४३ । १, २, ३, ५)
अन्य शास्त्रोंके संग्रहकी क्या आवश्यकता है? केवल गीताका ही भली प्रकारसे गान
( पठन और मनन ) करना चाहिये, क्योंकि यह भगवान् पद्मनाभ ( विष्णु ) के साक्षात्
मुखकमलसे प्रकट हुई है। गीता समस्त शास्त्रमयी है, श्रीहरि सर्वदेवमय हैं, गङ्गाजी
सर्वतीर्थमयी हैं और मनु सर्ववेदमय हैं । गीता, गङ्गा, गायत्री और गोविन्द-ये चार गकारसे
युक्त नाम जिसके हृदयमें बसते हैं, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। महाभारतरूपी अमृतके
सर्वस्व गीताको मथकर और उनमेंसे सार निकालकर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके मुखमें
उसका हवन किया है।

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