Friday, January 1, 2021

2, श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

किष्किन्धाकाण्डे सप्तष्टितमः सर्गः
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अनेक नक्षत्रपुजसे सुशोभित स्वातिमार्ग (छायापथ ) के बासवस्य सवजस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुवः।
समान प्रतीत होगा । वानरो ! आज समस्त प्राणी मुझे विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये ॥२८॥
भयंकर आकाशमें सीधे जाते हुए, ऊपर उछलते हुए और लक्षां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मतिः ।
नीचे उतरते हुए देखेंगे ।। २० ॥
प्वजधारी इन्द्र अथवा खपम्भू ब्रह्माजीके हाथसे भी मैं
महामेरुप्रतीकाशं मां द्रक्ष्यध्वं प्लवङ्गमाः ॥ २१॥ बलपूर्वक अमृत छीनकरा सहसा यहाँ ला सकता हूँ । समूची
दिघमावृत्य गच्छन्तं असमानमिवाम्बरम् । लङ्काको भी भूमिसे उखाड़कर हायपर उठाये चल सकता हूँ।
विधमिष्यामि जीमूतान कम्पयिष्यामि पर्वतान् । ऐसा मेरा विश्वास है। ॥ २८॥
सागरं शोषयिष्यामि धमानः समाहितः ॥ २२ ॥ तमेवं वानरश्रेष्ठं गर्जन्तममितप्रभम् ॥ २९॥
'कपिवरो ! तुम देखोगे, मैं महागिरि मेरुके समान
प्रहृष्टा हरयस्तत्र समुदैक्षन्त विस्मिताः ।
विशाल शरीर धारण करके स्वर्गको ढकता और आकाशको अमिततेजस्वी वानरभेष्ठ हनुमानजी जब इस प्रकार
निगलता हुआ-सा आगे बढुंगा, वादलोंको छिन्न-भिन्न कर गर्जना कर रहे थे, उस समय सम्पूर्ण पानर अत्यन्त हमें
डालूँगा, पर्वतोंको हिला दूगा और एकचित्त हो छलॉग भरकर चकितभावसे उनकी ओर देख रहे थे ॥ २९३ ॥
मारकर आगे बढ़नेपर समुद्रको भी सुखा दूंगा ॥ २१-२२ ।। तच्चास्य वचनं श्रुत्वा शातीनां शोकनाशनम् ॥३०॥
वैनतेयस्य वा शक्तिर्मम वा मारुतस्य वा ।
उवाच परिसंहष्टो जाम्बवान् वगेश्वर।
ऋते सुपर्णराजानं मारुतं वा महाबलम् । हनुमान्जीकी बातें भाई बन्धुओंके शोकको नए करने-
न तद् भूतं प्रपश्यामि यन्मां प्लुतमनुव्रजेत् ॥ २३ ॥ वाली थीं। उन्हें सुनकर वानर सेनापति जाम्बवान्को बड़ी
विनतानन्दन गरुडमे, मुझमें अथवा वायु देवतामें ही
प्रसन्नता हुई। वे बोले-॥ ३० ॥
समुद्रको लाँघ जानेकी शक्ति है । पक्षिराज गरुड अथवा वीर केसरिणः पुत्र वेगवन् मारुतात्मज ॥ ३१॥
महाबली वायु देवताके सिवा और किसी प्राणीको मैं ऐसा ज्ञातीनां विपुलः शोकस्त्वया तात प्रणाशितः।
नहीं देखता, जो यहाँसे छलाँग मारनेपर मेरे साथ जा 'वीर । केसरीके सुपुत्र ! वेगशाली पवनकुमार ! तात !
सके ॥ २३ ॥
तुमने अपने बन्धुओंका महान् शोक नष्ट कर दिया ॥३१॥
निमेषान्तरमात्रण
निरालम्बनमम्बरम्।
तव कल्याणरुवयः कपिमुख्याः समागताः ॥ ३२ ॥
सहसा निपतिष्यामि घनाद् विद्युदिवोत्थिता ॥ २४ ॥ मङ्गलान्यर्थसिद्ध्यर्थं करिष्यन्ति समाहिताः ।
'मेघसे उत्पन्न हुई विद्युत्की भाँति मैं पलक मारते- 'यहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याणकी
मारते सहसा निराधार आकाशमें उड़ जाऊँगा ॥ २४ ॥ कामना करते हैं। अब ये कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे एकाय-
भविष्यति हि मे रूपं प्लवमानस्य सागरम् ।
चित्त हो तुम्हारे लिये मङ्गलकृल्प-- स्वस्तिवाचन आदिका
विष्णोः प्रक्रममाणस्य तदा त्रीन् विक्रमानिव ॥२५॥ अनुष्ठान करेंगे ॥ ३२३ ॥
'समुद्रको लाँघते समय मेरा वही रूप प्रकट होगा, जो ऋषीणां च प्रसादेन कपिवृक्षमतेन च ॥ ३३ ॥
तीनों पोंको बढ़ाते समय वामनरूपधारी भगवान् विष्णुका गुरूणां च प्रसादेन सम्प्लव त्वं महार्णवम् ।
'ऋषियोंके प्रसाद, वृद्ध वानरोंकी अनुमति तथा गुरु-
हुआ था ॥ २५ ॥
जनोंकी कृपासे तुम इस महासागरके पार हो जाओ ॥३३॥
बुद्ध्या चाहं प्रपश्यामि मनश्चेष्टा च मे तथा ।
तव॥३४॥
अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीं प्रमोदध्वं प्लवङ्गमाः ॥ २६॥ स्थास्यामश्चैकपादेन यावदागमनं
'वानरो ! मैं बुद्धिसे जैसा देखता या सोचता हूँ, मेरे त्वद्गतानि च सर्वेषां जीवनानि वनौकसाम् ।
'जबतक तुम लौटकर यहाँ आओगे, तबतक हम
मनकी चेष्टा भी उसके अनुरूप ही होती है । मुझे निश्चय
तुम्हारी प्रतीक्षामें एक पैरसे खड़े रहेंगे क्योंकि हम सब
जान पड़ता है कि मैं विदेहकुमारीका दर्शन करूँगा, अतः
वानरोंका जीवन तुम्हारे ही अधीन है। ॥ ३४॥
अब तुमलोग खुशियाँ मनाओ ॥ २६ ॥
ततश्च हरिशार्दूलस्तानुवाच वनौकसः ॥ ३५॥
मारुतस्य समो वेगे गरुडस्य समो जवे ।
कोऽपि लोके न मे वेगं प्लवने धारयिष्यति ।
अयुतं योजनानां तु गमिष्यामीति मे मतिः ॥ २७ ॥
'मैं वेगमें वायुदेवता तथा गरुड़के समान हूँ। मेरा तो तदनन्तर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने उन बनवासी वानरोंसे
कहा-'जब मैं यहाँसे छलाँग मारूंगा, उस समय संसारमें
ऐसा विश्वास है कि इस समय मैं दस हजार योजनतक जा
कोई भी मेरे बेगको धारण नहीं कर सकेगा ।। ३५३ ।।
सकता हूँ ॥ २७ ॥

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