Friday, January 1, 2021

Gita Mahatmay Sanskrit to Hindi

गीता-माहात्म्य
श्रीभगवानुवाच
का सार निकालकर उसे भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके मुख में
न वन्धोऽस्ति न मोक्षोऽस्ति ब्रह्मवास्ति निरामयम् ।
डाल दिया ॥६॥ गङ्गामें प्रतिदिन स्नान करनेसे मनुष्यों-
नैकमस्ति न च द्वित्वं सच्चित्कारं विजृम्भते ॥ १ ॥ का मैल दूर होता है, परन्तु गीतारूपिणी गङ्गाके जलमें एक
गीतासारमिदं शास्त्रं सर्वशास्त्रसुनिश्चितम् । ही बारका स्नान सम्पूर्ण संसार-मलको नष्ट करनेवाला है।
यत्र स्थितं ब्रह्मज्ञानं वेदशास्त्रसुनिश्चितम् ॥ २॥ गीताके सहस्र नामोंद्वारा जो स्तवराज निर्मित हुआ है, वह
इदं शास्त्रं मया प्रोक्तं गुह्यवेदार्थदर्पणम् ।
जिसकी कुक्षि (हृदय ) में वर्तमान हो अर्थात् जो उसका
यः पठेत्प्रयतो भूत्वा स गच्छेद्विष्णुशाश्वतम् ॥ ३॥
मन-ही-मन स्मरण करता हो, वह भी साक्षात् नारायणका
श्रीभगवान् बोले- न बन्धन है, न मोक्ष; केवल
स्वरूप कहा गया है ॥८॥
निरामय ब्रह्म ही सर्वत्र विराजमान है । न अद्वैत है, न द्वैत; सर्ववेदमयी गीता सर्वधर्ममयो
केवल सच्चिदानन्द ही सब ओर परिपूर्ण हो रहा है॥१॥ सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्वदेवमयो
मनुः।
हरिः ॥ ९ ॥
गीताका सारभूत यह शास्त्र सम्पूर्ण शास्त्रोद्वारा भलीभाँति पादस्याप्यर्धपादं वा श्लोकं श्लोकार्धमेव वा ।
निश्चित सिद्धान्त है, जिसमें वेद-शास्त्रोंसे अच्छी तरह नित्यं धारयते यस्तु स मोक्षमधिगच्छति ॥ १० ॥
निश्चित किया हुआ ब्रह्मज्ञान विद्यमान है ॥२॥ मेरेद्वारा कृष्णवृक्षसमुद्भूता
गीतामृतहरीतकी।
कहा हुआ यह गीताशास्त्र वेदके गूढ़ अर्थको दर्पणकी मानुषैः किं न खायेत कलौ मलविरेचनी ॥ ११ ॥
भाँति प्रकाशित करनेवाला है; जो पवित्र हो मन-इन्द्रियोंको वाम पद्मनाभस्य पावनं किं कलौ युगे ॥ १२ ॥
गङ्गा गीता तथा भिक्षुः कपिलाश्वत्थसेवनम् ।
वशमें रखकर इसका पाठ करता है, वह मुझ सनातनदेव गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।
भगवान् विष्णुको प्राप्त होता है ॥३॥
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥ १३ ॥
एतत्पुण्यं पापहरं धन्यं दुःखप्रणाशनम् । आपदं नरकं घोरं गीताध्यायी न पश्यति ॥ १४ ॥
पठतां शृण्वतां वापि विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४ ॥ गीता सम्पूर्ण वेदमयी है, मनुस्मृति सर्वधर्ममयी है, गङ्गा
अष्टादशपुराणानि नवव्याकरणानि
सर्वतीर्थमयी है तथा भगवान् विष्णु सर्वदेवमय हैं ॥ ९॥जो
निर्मथ्य चतुरो वेदान् मुनिना भारतं कृतम् ॥ ५॥
गीताका पूरा एक श्लोक, आधा श्लोक, एक चरण अथवा
भारतोदधिनिर्मथ्य गीतानिर्मथितस्य
आधा चरण भी प्रतिदिन धारण करता है, वह अन्तमें मोक्ष
सारमुद्धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे धृतम् ॥ ६॥
मलनिर्मोचनं पुंसां गङ्गास्नानं दिने दिने ।
प्राप्त कर लेता है ॥१०॥ मनुष्य श्रीकृष्णरूपी वृक्षसे प्रकट
सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम् ॥ ७॥ हुई गीतारूपी अमृतमयी हरीतकीका भक्षण क्यों नहीं करते,
गीतानामसहस्रण स्तवराजो
विनिर्मितः।
जो समस्त कलिमलको शरीरसे बाहर निकालनेवाली है।११।
यस्य कुक्षौ च वर्तेत सोऽपि नारायणः स्मृतः ॥ ८॥ कलियुगमें श्रीगङ्गाजी, गीता, सच्चे संन्यासी, कपिला गौ,
भगवान् विष्णुका यह उत्तम माहात्म्य(गीताशास्त्र) पढ़ने अश्वत्थवृक्षका सेवन और भगवान् विष्णुके पर्व-दिन(एकादशी
और सुननेवालोंके पुण्यको बढ़ानेवाला,पापनाशक,धन्यवाद- आदि) इनसे बढ़कर पवित्र करनेवाली और क्या वस्तु हो
के योग्य और समस्त दुःखोंको दूर करनेवाला है ॥ ४ ॥ सकती है १ ॥१२॥अन्य शास्त्रोंके विस्तारसे क्या प्रयोजन ?
मुनिवर व्यासने अठारह पुराण, नौ व्याकरण और चार केवल गीताका ही सम्यक् प्रकारसे गान (पठन और मनन )
वेदोंका मन्थन करके महाभारतकी रचना की ॥५॥ फिर करना चाहिये; जो कि साक्षात् भगवान् विष्णुके मुख-कमल-
महाभारतरूपी समुद्रका मन्थन करनेसे प्रकट हुई गीता से प्रकट हुई है ॥१३॥ गीताका स्वाध्याय करनेवाले मनुष्य-
भी मन्थन करके [ उपयुक्त गीतासारके रूपमें ] उसके अर्थ- को आपत्ति और घोर नरकको नहीं देखना पड़ता॥१४॥
इति श्रीस्कन्दपुराणे ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-
संवादे श्रीगीतासारे भगवद्गीतामाहात्म्यं सम्पूर्णम् ।

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